Wednesday, 17 October 2018

सऊदी अरब के बिछड़ने से क्यों डरते हैं ट्रंप

ये ऐसा वक़्त है जब अमरीका में एक अदूरदर्शी स्थिति बनी हुई है. ट्रंप प्रशासन पर दुनिया भर में हो रही नाइंसाफ़ी की वारदातों पर तमाशबीन बनकर देखते रहने के आरोप लग रहे हैं.
अमरीका इस मामले में अकेला नहीं है. चीनी इंटरपोल के प्रमुख मेंग हॉन्गवी को चीन प्रशासन के नज़रबंद करने का मामला या सैलिसबरी में केमिकल हमले में क्रेमलिन के संलिप्त होने के सुराग़ हो. इन सभी मामलों पर सरकारों ने चुप रहना ही ठीक समझा.
इसी कड़ी में बड़ा मामला सऊदी अरब के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी के लापता होने का है. जमाल ख़ाशोज्जी दो अक्टूबर को तुर्की के अंकारा स्थित सऊदी अरब के वाणिज्यिक दूतावास गए और वहां से वापस नहीं लौटे. लेकिन अब तक राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मुद्दे पर सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा, जिससे लगे कि वो मानवाधिकारों को लेकर चिंतित हैं.
दुनिया भर के देशों में अधिनायकवाद चरित्र वाले सत्ता पर क़ाबिज हो रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय नियमों को धत्ता बता रहे हैं. यह एक नए युग की शुरुआत है, जहां मूल्यों पर हित हावी हैं.
पारंपरिक तौर पर अमरीका हमेशा नियमों का पालन करने वाला देश रहा है. इसे नेतृत्व का नैतिक उदाहरण माना जाता रहा है. दुनिया भर के देशों की ग़लत गतिविधियों पर अमरीका लगभग मुखर होकर सामने आया है.
लेकिन हाल के वक़्त में डोनल्ड ट्रंप ने अपनी भूमिका से लोगों को निराश किया है. इसके साथ ही एक ख़तरा ये भी पैदा हो रहा है कि क्या ट्रंप के देशभक्ति के सिद्धांत के ज़रिए अमरीका दुनिया में एक नकारात्मक संदेश तो नहीं दे रहा.या अमरीका में लाल, सफ़ेद और नीले रंग के झंडे के साथ दिया गया 'अमरीका फर्स्ट' का नारा दुनिया को एक हरी झंडी तो नहीं दे रहा जिसकी आड़ में बाक़ी देश अपनी मनमानी कर सकें.
आख़िर खुलकरक्यों नहीं बोल रहे ट्रंप?
बुधवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी अरब के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी के संदिग्ध परिस्थिति में लापता होने के मामले को 'बेहद गंभीर' बताया. कहा गया कि अमरीका इस मामले में रियाद के साथ उच्च स्तर पर अपनी चिंता ज़ाहिर कर चुका है.
अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन और ट्रंप के दामाद जैरेड कशनर ने सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से इस मामले में बात की और व्हाइट हाउस के अधिकारी जल्द ही जमाल ख़ाशोज्जी की मंगेतर हदीजे जेनगीज़ से मुलाक़ात करेंगे.
इन सब के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी अरब की निंदा या आलोचना नहीं की है. इसके अलावा रैलियों में अपनी राय खुलकर रखने वाले ट्रंप ने लोवा की रैली में एक बार भी लापता पत्रकार का ज़िक्र नहीं किया.इससे साफ़ है कि व्हाइट हाउस किसी भी तरह के जजमेंट और रियाद से जवाब मांगने पर कोई जल्दबाज़ी नहीं चाहता. ट्रंप अपने क़रीबी सऊदी पर किसी भी तरह की तीखी टिप्पणी करने से बचना चाहते हैं.
फॉरेन रिलेशन कमिटी के प्रमुख बॉब कॉरकर का कहना है, ''अगर सऊदी इस मामले में दोषी पाया जाता है इसके परिणाम बुरे होंगे.''
इसके अलावा गोल्फ़ बडी की प्रमुख लिंडसे ग्राहम कहती हैं, ''व्हाइट हाउस से इस पूरे मामले पर बड़ा बयान ना आने की एक वजह ये भी है कि इसका परिणाम अमरीका-सऊदी के रिश्तों के लिए भयानक हो सकता था.''
अपने पहले सऊदी अरब के दौरे पर राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी नेताओं के साथ एक रौशनी से भरे ग्लोब पर हाथ रखा था. यहीं से दोनों देश के नेताओं के दोस्ती का सफ़र शुरू हुआ.
अमरीका ने सऊदी अरब के यमन में की गई बमबारी को भी अपना समर्थन दिया. बुधवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने 33 वर्षीय प्रिंस सलमान की तारीफ़ में उन्हें 'एक भला आदमी' बताया था.

ट्रंप की विदेश नीति का एक सबसे अहम हिस्सा ये है कि वे दुनिया के तमाम शक्तिशाली नेताओं की तारीफ़ करते हैं. मसलन किम जोंग उन को बेहतरीन शख़्स बताने जैसे बयान.
किम जोंग उन एक ऐसे शासक हैं जिन पर नृशंस हत्या और हिंसा के कई आरोप लगते रहे हैं. इसके वाबजूद ट्रंप ने अपनी वर्जिनिया की रैली में कहा कि उन्हें किंम जोंग उन से 'प्यार' हो गया.
इतना ही नहीं ट्रंप मिस्र के निरंकुश शासक अब्देल फ़तेह अल-सीसी को भी 'बेहतरीन शख्स' बता चुके हैं. ऐसे कई विवादित नेताओं के नाम ट्रंप की लिस्ट के हिस्सा हैं.
ट्रंप प्रशासन की आवाज़ संयुक्त राष्ट्र में रखने वाली निकी हेली के इस्तीफ़े से भी ट्रंप प्रशासन को झटका लगा है. इस साल के अंत तक उनके पद छोड़ने के बाद इस प्रशासन से एक ऐसी आवाज़ भी छिन जाएगी जो अंतरराष्ट्रीय नियमों की बड़ी रक्षक मानी जाती रही हैं.
निकी हेली मॉस्को और दमिष्क की बड़ी आलोचक रही हैं. लेकिन उन्हें भी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार काउंसिल से अमरीका के हटने के फ़ैसले पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा.
जब अमरीका ने अपनाया कड़ा रुख़
ऐसा भी नहीं है कि अमरीका ने किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर हरकत नहीं की है. असद शासन के केमिकल हमलों के ख़िलाफ़ अमरीका के हवाई हमले उसकी प्रतिक्रिया का एक हिस्सा है.
हालिया वक़्त में ट्रंप प्रशासन ने इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट पर कड़े तेवर अपनाए हैं. दरअसल अफ़गानिस्तान में तैनात अमरीकी सैनिकों के कथित कब्ज़े के मामले में इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) मुक़दमा चलाने पर विचार कर रहा है.
इसके जवाब में सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने आईसीसी को दिए जाने वाले फ़ंड पर प्रतिबंध लगाने और इनके न्यायधीशों पर अमरीकी कोर्ट में आपराधिक मामले चलाने की चेतावनी दी है.
राष्ट्रपति ट्रंप आजकल अपने घरेलू दुश्मनों को ही आड़े हाथों ले रहे हैं. वे पत्रकार ख़ाशोज्जी के विषय पर कुछ भी साफ़ तौर पर नहीं बोल रहे हैं.

Thursday, 4 October 2018

ग्राउंड रिपोर्टः असम नागरिकता रजिस्टर से कितने हिंदू बाहर

भारत-म्यांमार को जोड़नेवाली स्टिलवेल रोड पर है डमरू उपाध्याय की मोमो की दुकान, और पास ही घर, जहां बीजेपी विधायक भास्कर शर्मा और अपनी तस्वीर के पास बैठे 'गोरखाली' डमरू कहते हैं, "गोरखा लोगों को सिर्फ़ मरने के लिए तैयार किया जाता है, आओ देश के लिए मर जाओ, हम आपको देंगे कुछ नहीं."
परिवार का नाम नागरिकता रजिस्टर में न आने पर डमरू अगर भन्नाए हुए हैं तो 22 सालों से संघ और बीजेपी से जुड़े मूलत: बिहार के चंद्र प्रकाश जायसवाल के मुताबिक़ लोगों में डर है कि अगर फ़ाइनल एनआरसी में भी नाम नहीं आया तो क्या होगा?
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के संसद में दिए '40 लाख घुसपैठिये' वाले बयान पर लोग ऐतराज़ जता रहे हैं और यकीन भी नहीं, क्योंकि समय बीतने के साथ-साथ ये साफ़ हो रहा है कि एनआरसी से बाहर रखे गए 40 लाख लोगों में से ज़्यादातर संख्या हिंदुओं की है.
हालांकि अभी कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है और ये संख्या 20-22 लाख तक बताई जा रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ नेता ओशीम दत्ता असम नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए हिंदुओं की संख्या 30 लाख तक बताते हैं.
'हिंदू हितों' की बात करनेवाली बीजेपी के लिए ये एक मुश्किल स्थिति है.
पिता और चाचा की जायदाद साझी थी इसलिए श्याम सुंदर जायसवाल के पास कोई दस्तावेज़ नहीं, जो थे वो 1950 के असम भूकंप की भेंट चढ़ गए जब सादिया और पास के इलाक़े की आबादी का बड़ा हिस्सा नदी में समा गया था.
पान और पंचर लगाने की दुकान चलाने वाले 51-साल के श्याम सुंदर जायसवाल का परिवार तीन पीढ़ी पहले असम आया था, लेकिन अब उनका सवाल एक ही है असम से निकाले गए तो जाएंगे कहां?
"और अगर निकाले न भी गए तब लोग कह रहे हैं कि एनआरसी में नाम नहीं शामिल होने पर न राशन का कोटा मिलेगा, न वोटर कार्ड और न ही बैंक खाता खुल सकेगा, और ना ही जायदाद ले पाएंगे," वो बड़े फिक्रमंद लहजे में कहते हैं.
पास बैठे बेटे मिंटू जायसवाल कहने लगते हैं कि शादीशुदा बहन की नौकरी का बुलावा आ गया है, उसे एनआरसी सर्टिफिकेट जमा करना है, सुसराल से बार-बार तकाज़ा आ रहा है मगर कुछ समझ में नहीं आ रहा क्या करें?
हेडगवार, गोलवलकर और शिवाजी की तस्वीरों वाले अपने कार्यालय में बैठे चंद्र प्रकाश जायसवाल कहते हैं, "आज तीन रुपये किलो पर ग़रीब परिवार के प्रत्येक सदस्य को मिल रहा पांच किलो चावल, बीपीएल गैस कनेक्शन, सभी सरकारी योजनाओं का लाभ, यहां तक कि जाति प्रमाण पत्र तक बनाना नामुमकिन हो जाएगा."
साइनाकी गांव में चाय के बागान में काम कर रहीं लोक्खी घटवार के पास "ख़ाली पैन कार्ड और राशन कार्ड है, वोटर कार्ड मालिक के पास है" जिसने उसे भरोसा दिलाया है कि वो उसका एनआरसी बनवा देगा.
लोक्खी को तो ये भी मालूम नहीं कि वो मूलत: कहां से हैं हालांकि उसकी मां सावित्री घटवार कहती है कि उसके बाबा बिहार दुमका (पहले बिहार और झारखंड एक ही राज्य थे) से असम आए थे.
असम जो कभी मुग़ल साम्राज्य का भी हिस्सा नहीं रहा, ब्रितानियों के क़ब्ज़े में 1826 में आया जिसके बाद यहां चाय की खेती शुरू हुई और झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से बड़े पैमाने पर आदिवासी यहां लाए गए.
मगर एक झोले में समा जानेवाली कुल जमा-पूंजी के मालिक इन आदिवासियों में से काफ़ी के पास वो दस्तावेज़ ही नहीं जो आवेदन के लिए ज़रूरी हैं, न इनके पास उन्हें जुटाने की समझ या आर्थिक सामर्थ्य है और न ही किसी तरह का संगठनात्मक सहयोग, तो बहुतों ने तो एनआरसी के लिए दरख्वास्त ही नहीं दिया, तो ज़ाहिर है, हज़ारों आदिवासियों के नाम एनआरसी में नहीं हैं.
कहा जाता है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल जैसे सूबों से 'ग्रो मोर फूड' के नाम पर खेतिहर मज़दूर भी ब्रितानियों के दौर में ही लाए गए थे. और बहुत सारे लोग वहां से भी असम आये जो पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है.
तो क्या पहले से ही दयनीय स्थिति में काम कर रहे चाय मज़दूरों की स्थिति, नागरिकता के बिना, किसी बंधुआ मज़दूर सी होने का डर है, और बाक़ी लोगों का क्या होगा जिसमें से बड़ी तादाद आर्थिक रूप से बहुत सक्षम नहीं है?
हाल में हुई ख़ुदकुशी के कई मामलों को इससे जोड़ा जा रहा है जबकि प्रशासन का कहना है कि इनकी वजहें और हो सकती हैं.
इन सवालों पर डिब्रुगढ़ यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर कौस्तुभ डेका कहते हैं, "ये शायद अंग्रेज़ों के जाने के बाद से होनेवाली बड़ी त्रासदियों में से एक है हालांकि इसकी बहुत सी परतें अभी खुल ही रही हैं."
शायद इसलिए अभी इन मुद्दों पर बहुत चर्चा सुनने में नहीं आ रही कि, उनका क्या होगा जो नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह जाएंगे, ख़ासतौर पर उनका जो मूल रूप से भारत के दूसरे प्रदेशों से यहां आए या लाए गए, या फिर आर्थिक और सामाजिक तौर पर इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं?
या उन कथित बांग्लादेशियों का क्या होगा क्योंकि बांग्लादेश के मंत्री हसनुल हक़ साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि ये भारत का आंतरिक मामला है और बांग्लादेश का इससे कुछ लेना-देना नहीं.
फ़िलहाल अलग-अलग समूह इसे अपने-अपने नज़रिये से देख रहे हैं - एनआरसी से बाहर रह गए बांग्ला भाषी इसे बंगालियों के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह का नतीजा मान रहे, तो मुस्लिम इसे मज़हब से जोड़कर देख रहे हैं.हीं ख़ुद को मूल असमिया मानने वाला एक बड़ा तबक़ा अंदेशा जता रहा है कि "एनआरसी का काम ठीक ढंग से नहीं हुआ," और बाहर रखे गए लोगों की तादाद 40 लाख से और अधिक होनी चाहिए थी.
जानी-मानी पत्रिका प्रांतिक के संपादक प्रदीप बरुआ कहते हैं, "जैसे-जैसे बातें सामने आ रही हैं एनआरसी के फुलप्रूफ़ होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं."
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, जिन्होंने एनआरसी पर कांग्रेस को चैलेंज करने वाले लहजे में कहा था "हममें हिम्मत है तो हम कर रहे हैं," की पार्टी के प्रांतीय नेता और यहां तक कि ख़ुद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल इस मामले पर कुछ कहने से बचते हैं.