पाकिस्तानी बच्चों को घर या स्कूल में पढ़ाया या बताया जाता है कि मुसलमानों के आने से पहले हिंदुस्तान अंधेरों में डूबा हुआ था.
रोशनी यहां इस्लाम लेकर आया. ईरान, मध्य एशिया और अरब से सूफ़ी लोग आए तो भेदभाव से तंग आए हिंदू मुसलमान होने लगे. बाहर से आकर हिंदुस्तान में बसने वाले तुर्क, ईरानी और अरब अपने साथ खान पान के नए तरीके लाएकपड़ों का फ़ैशन लाए. तस्वीरें बनाने का फ़न आया. शायरी और म्यूज़िक आया. ताजमहल जैसी ख़ूबसूरत इमारतें बनीं.
मुसलमान बादशाहों ने मुकामी हिंदुस्तानियों को तहजीब सिखाई. उनका रहन सहन अच्छा हुआ. हिंदू समंदर पार सफ़र करने से डरते थे. मुसलमान मल्लाहों की देखा देखी उनका समंदर से डर कम हुआ और वो हिंदुस्तान से बाहर जाने लगे और यूं उनके दिमाग से जाले उतरने लगे.
महमूद गज़नवी, मोहम्मद गौरी, शाहजहां, औरंगज़ेब हीरो हैं. पृथ्वीराज चौहान, शिवाजी, गांधी जी मुसलमान दुश्मन विलेन हैं.
1857 की जंग ए आज़ादी दरअसल अंग्रेज़ों और मुसलमानों की लड़ाई थी. इस जंग के बाद हिंदुओं ने मुसलमानों को हर मैदान में नीचा दिखाने के लिए अंग्रेज़ों से गठजोड़ कर लिया. चुंनाचे तंग आकर मुस्लिम लीग कायम हुई और फिर मुस्लिम लीग ने हिंदुओं और अंग्रेज़ों से मुसलमानों को आज़ाद करवाकर पाकिस्तान बनाया. लाख मुसलमान हिंदुओं और सिखों के हाथों मारे गए. 1965 के युद्ध में भारत को क़रारी हार हुई. चुंनाचे भारत ने पश्चिमी पाकिस्तान में बस रहे हिंदुओं से साजिश करके बांग्लादेश बना दिया.
भारतीय बच्चों को घर या स्कूल में पढ़ाया या बताया जाता है कि मुसलमानों के आने से पहले भारत में सुख चैन और प्रगति थी. साइंस और गणित में प्राचीन भारत सबसे आगे था और सोने की चिड़िया कहलाता था.
महमूद गज़नवी से औरंगज़ेब तक सब गैरमुल्की लुटेरे हैं. उन्होंने मंदिर तोड़े. उनके ऊपर मस्जिदें बनाईं. लाखों हिंदुओं को क़त्ल किया. ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया. अगर पृथ्वीराज चौहान, शिवाजी वगैरह न होते तो हिंदुओं को ये गैरमुल्की मुसलमान ग़ुलाम बनाए रखते.
अंग्रेज़ ने मुगलों का ख़ात्मा किया. मगर 1857 की जंग ए आज़ादी के हीरो मंगल पांडेय और झांसी की रानी हैं. अंग्रेज़ों ने भी मुसलमान बादशाहों की तरह भारत को खूब लूटा. मुसलमानों ने आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस का साथ देने की बजाए अंग्रेज़ों की हौसला अफ़जाई से लड़ाओ और हुकूमत करो की पॉलिसी के तहत मुस्लिम लीग बनाई.
मुस्लिम लीग ने भारतीय एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेज़ी एजेंडा आगे बढ़ाया और इनाम में पाकिस्तान पाया.
अब जब ये पाकिस्तानी और भारतीय बच्चे बड़े होकर राजनीति में जाते हैं. फ़ौज में भर्ती होते हैं. राजनयिक और बाबू बनते हैं. तो हम उन्हीं से उम्मीद रखते हैं कि वो भारत और पाकिस्तान के संबंधों में एक दिन सुधार लाएंगे.
लखनऊ शहर के एक उन्नत इलाक़े में
अमरीकी कंपनी एप्पल के लिए काम करने वाले युवक की हत्या, इस बात का साफ़
प्रमाण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस की नज़र में इंसान जान
की क़ीमत कितनी कम है.
योगी आदित्यनाथ एक मठ के प्रमुख से उठकर, देश
के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं. उनकी पुलिस किस तरह से न्याय देने के 'पश्चिमी देशों वाले' निरंकुश रवैये को अपना रही है, ये
भी इस घटना से साफ़ गया है.सूबे में अपराध रोकने के नाम पर आदित्यनाथ योगी के नेतृत्व में यूपी पुलिस ने 'एनकाउंटर' जैसे मध्यकालीन साधन अपना लिये हैं, जिन्होंने पुलिस को एक ऐसा शिकारी बना दिया है जो ख़ुद को ही क़ानून समझने लगे हैं.
38 साल के विवेक तिवारी 28 सितंबर की रात अपनी कंपनी की एक पार्टी से घर लौट रहे थे जब उनका सामना यूपी पुलिस के एक जवान से हुआ. पुलिसवाले का दावा है कि उन्होंने विवेक की कार को रोकने की कोशिश की थी.
लेकिन सहज ज्ञान यही कहता है कि देर रात अगर कोई कार रोके तो रुकना ठीक नहीं है. फिर उत्तरप्रदेश में तो इसे लेकर (सुरक्षा पर) चर्चा हमेशा से ही रही है. विवेक ने भी शायद उसी बात का पालन किया.सा उन्होंने शायद इसलिए भी किया हो कि एक महिला सहकर्मी उनके साथ कार में मौजूद थीं जिन्हें विवेक घर छोड़ने वाले थे.
लेकिन कार नहीं रोकने के जवाब में यूपी पुलिस के जवान ने पिस्टल निकालकर उनपर गोली चलाना ज़्यादा ठीक समझा. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, गोली कार के अगले शीशे को भेदती हुई विवेक के गले के पास लगी और उनकी मौत हो गई.
विवेक की सहकर्मी सना ख़ान जो कि इस मामले की अकेली चश्मदीद हैं, वो अभी भी सदमे से बाहर नहीं निकल पाई हैं.
लेकिन उन्हें ये ठीक से याद है कि विवेक ने कैसे सड़क के बीच में खड़ी पुलिस की मोटरसाइकल को बचाते हुए अपनी कार आगे निकाली थी. लेकिन ऐसा करने की सज़ा पुलिसवाले ने उन्हें दी.
इस घटना ने लोगों में अनुशासन नहीं बल्कि पुलिस का डर बैठाया है. अगर विवेक ने गाड़ी रोक भी ली होती तो क्या उनके साथ हाथापाई की संभावना बिल्कुल नहीं होती? या उससे बदतर भी हो सकता था.
आख़िरकार रात में पुलिस द्वारा लोगों के उत्पीड़न के बारे में किसने नहीं सुना है. ऐसे में विवेक ने जो अपनी समझ से चुना, उसका नतीजा इतना ख़ौफ़नाक साबित हुआ.
साल 1960 में इलाहबाद कोर्ट के नामी न्यायाधीश रहे ए एन मुल्ला ने अपने एक फ़ैसले में कहा था, "मैं ये पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि पूरे देश में एक भी ग्रुप नहीं है जिसके अपराध का रिकॉर्ड, उस संगठित इकाई के क्राइम रिकॉर्ड से टक्कर ले सके जिसे इस देश में भारतीय पुलिस बल के नाम से जाना जाता है."
जब भी कोई ऐसी घटना सुनाई पड़ती है जिसमें पुलिस द्वारा किसी को गोली मारे जाने का उल्लेख होता है, हर बार मुझे 1960 का कोर्ट का वो फ़ैसला याद आ जाता है.
निश्चित तौर पर यूपी पुलिस के दृष्टिकोण में रत्ती भर बदलाव नहीं आया है. या ये कहें कि वक़्त के साथ पुलिस का दृष्टिकोण ख़राब ही हुआ है, तो ग़लत नहीं होगा.
कुछ महीने पहले ही यूपी के पुलिस चीफ़ रहे सुलखान सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ब्रिटिश काल की पुलिस भी ईमानदारी और व्यवहार के मामले में तुलनात्मक रूप से आज की यूपी पुलिस से बेहतर थी.
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